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Indian Civil Service (ICS) Exam से आज़ादी की राह तक: सत्येंद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस के रोचक किस्से

सत्येंद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस, दोनों ने ब्रिटिश शासन के दौर में Indian Civil Service (ICS) की प्रतियोगी परीक्षा पास की थी। लेकिन दोनों की कहानी का अंत बिल्कुल अलग रहा।

एक जरूरी सुधार: आज जिसे हम IAS कहते हैं, वह स्वतंत्र भारत की सेवा है। उस समय सेवा का नाम ICS (Indian Civil Service) था। स्वतंत्रता के बाद ICS की जगह IAS जैसी सेवाएँ बनीं।

1. सत्येंद्रनाथ टैगोर: पहले भारतीय जिन्होंने ICS पास किया

सत्येंद्रनाथ टैगोर (1842–1923) रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। वे 1863 में ICS परीक्षा पास करने वाले पहले भारतीय बने। उस समय परीक्षा लंदन में होती थी, इसलिए एक भारतीय युवक के लिए यह सिर्फ पढ़ाई की परीक्षा नहीं, बल्कि विदेश जाकर ब्रिटिश व्यवस्था के सबसे ऊँचे प्रशासनिक पदों में प्रवेश करने की असाधारण चुनौती थी।

दिलचस्प किस्सा:
वे 1862 में इंग्लैंड गए और प्रशिक्षण पूरा करके 1864 में भारत लौटे। उनकी पहली महत्वपूर्ण नियुक्तियों में अहमदाबाद में Assistant Magistrate और Collector का काम शामिल था।

लेकिन सत्येंद्रनाथ केवल सरकारी अफसर बनकर नहीं रह गए। वे लेखक, कवि, भाषाविद् और सामाजिक सुधारक भी थे। वे ब्रह्म समाज से जुड़े और 1867 में हिंदू मेला की स्थापना में भी भूमिका निभाई—जिसका उद्देश्य भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाना था।

यानी रोचक बात यह है कि ब्रिटिश प्रशासन के भीतर प्रवेश करने वाले पहले भारतीय ICS अधिकारी ही आगे चलकर भारतीय सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने वाले लोगों में शामिल हुए।


2. सुभाष चंद्र बोस: परीक्षा में चौथा स्थान, लेकिन नौकरी से इनकार

अब कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है।

सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में ICS की प्रतियोगी परीक्षा दी और चौथा स्थान हासिल किया। उस वर्ष केवल छह रिक्तियाँ थीं। यानी वे बेहद कठिन प्रतियोगिता में बहुत ऊँची रैंक पर आए थे।

और यहाँ एक रोचक विरोधाभास है:

जिस नौकरी को पाने के लिए भारतीय युवक सपना देखते थे, सुभाष ने उसे जान-बूझकर छोड़ दिया।

परीक्षा के बाद वे ICS probationer बने, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगा कि ब्रिटिश सरकार की सेवा करते हुए वे भारत की स्वतंत्रता के लिए अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएँगे। अप्रैल 1921 में उन्होंने अपना नाम ICS probationers की सूची से हटाने का निर्णय लिया।

22 अप्रैल 1921 को उन्होंने ब्रिटिश Secretary of State for India Edwin Montagu को अपना इस्तीफा भेजा।

एक खास बात—उन्होंने पैसे भी वापस करने की बात कही

उनके इस्तीफे के समय उन्हें ICS से £100 का allowance मिल चुका था। इस्तीफे के पत्र में बोस ने लिखा कि इस्तीफा स्वीकार होने पर वे यह रकम India Office को वापस कर देंगे।

यह छोटा-सा प्रसंग उनके चरित्र का दिलचस्प संकेत देता है—वे केवल नौकरी छोड़कर निकल नहीं गए; उन्होंने औपचारिक रूप से यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा से मिले पैसे का हिसाब चुकाना चाहते हैं।


और सबसे दिलचस्प समानता

इन दोनों की कहानियों को साथ रखकर देखें तो एक अद्भुत तस्वीर बनती है:

सत्येंद्रनाथ टैगोरसुभाष चंद्र बोस
परीक्षाICSICS
वर्ष18631920
उपलब्धिपहले भारतीय ICS अधिकारीचौथी रैंक
ब्रिटिश सेवा में गए?हाँनहीं—प्रशिक्षण/प्रोबेशन के दौरान छोड़ दी
आगे क्या किया?प्रशासन + सामाजिक सुधार + साहित्यस्वतंत्रता आंदोलन और राजनीति

एक ने बंद दरवाजे को पहली बार भारतीयों के लिए खोला; दूसरे ने उसी प्रतिष्ठित सेवा का दरवाजा खोलकर बाहर निकलना चुना।

और शायद यही वजह है कि दोनों की ICS कहानी भारतीय इतिहास में इतनी यादगार है।

एक और रोचक तथ्य: ICS परीक्षा 1922 तक मुख्यतः लंदन में होती थी, इसलिए उस दौर में परीक्षा पास करना आज की UPSC परीक्षा पास करने से अलग तरह की चुनौती था। उम्मीदवार को समुद्र पार करके ब्रिटेन जाना पड़ता था और ब्रिटिश शिक्षा-संस्कृति के अनुरूप परीक्षा देनी पड़ती थी।

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